AI को लेकर बहस एक बार फिर सुर्खियों में हैं। OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन ने हाल ही में भारत में एक इवेंट के दौरान कहा कि एडवांस AI मॉडल को ट्रेन करने में लगने वाली ऊर्जा की तुलना इंसान को बड़ा और शिक्षित बनाने में लगने वाले दशकों के संसाधनों से की जानी चाहिए।
उनके अनुसार, AI की ऊर्जा खपत काफी बढ़ रही है, लेकिन एक इंसान को “स्मार्ट” बनाने में करीब 20 साल का समय और उस दौरान खर्च होने वाले संसाधन भी कम नहीं होते। उन्होंने यह भी कहा कि m AI की रफ्तार कम करने पर नहीं, बल्कि क्लीन एनर्जी की ओर शिफ्ट होने पर होना चाहिए।
AI को लेकर श्रीधर वेम्बू ने क्या कहा?
हालांकि Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने इस तुलना से असहमति जताई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि वह ऐसी दुनिया नहीं देखना चाहते जहां किसी टेक्नोलॉजी की तुलना इंसान से हो। वेम्बू के अनुसार, टेक्नोलॉजी को इंसानी जीवन पर हावी नहीं होना चाहिए, बल्कि बैकग्राउंड में रहकर इंसानों की मदद करनी चाहिए। उन्होंने आगे चेतावनी दी कि मशीनों को इंसानों के बराबर रखना सही दिशा नहीं है और टेक्नोलॉजी को मानवता की सेवा करनी चाहिए।
वेम्बू की टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब AI के सांस्कृतिक और नैतिक प्रभाव को लेकर टेक इंडस्ट्री में चर्चा काफी बढ़ रही है। उन्होंने हाल ही में एक अन्य पोस्ट में बड़ी टेक कंपनियों की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से भी की थी। वेम्बू ने लिखा कि आज की बड़ी टेक कंपनियां कई सोवरेन देशों से भी ज्यादा ताकतवर हो गई हैं।
यह टिप्पणी एक ऐसे पोस्ट के जवाब में सामने आई थी, जिसमें बताया गया था कि Google ने एक ही दिन में 32 अरब डॉलर का कर्ज जुटाया है, जो कुछ देशों के महीनों के फंड रेजिंग के बराबर है। साथ ही कंपनी ने 100 साल की अवधि वाला बॉन्ड भी जारी किया। इस उदाहरण के अनुसार, वेम्बू ने संकेत दिया कि बड़ी टेक कंपनियां अब फंडिंग और समय सीमा के लिहाज से सरकारों जैसी ताकत रखती हैं।
लेखक की राय
AI बनाम इंसान की तुलना तकनीकी बहस से ज़्यादा नैतिक प्रश्न खड़े करती है।
ऊर्जा की चर्चा ज़रूरी है, लेकिन मानव मूल्य की बराबरी मशीन से करना संवेदनशील विषय है।
AI विकास और मानव गरिमा—दोनों के बीच संतुलन बनाना ही असली चुनौती है।
आख़िरकार, तकनीक का उद्देश्य इंसान से आगे निकलना नहीं, बल्कि इंसान को आगे बढ़ाना होना चाहिए।
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